संसार में प्रथम तो वैराग्य होना कठिन है। यदि वैराग्य हो भी गया तो कर्म" यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हारी कृपा पाव कोई कोई।।"काण्ड का छूटना कठिन है। यदि कर्मकाण्ड से छुटकारा मिल गया तो काम क्रोधादि से छूटकर दैवी सम्पत्ति प्राप्त करना कठिन है। यदि दैवी संपत्ति भी आ गई तो भी सदगुरु मिलना कठिन है। यदि सदगुरु भी मिल जाय तो भी उनके वाक्य में श्रद्धा होकर ज्ञान होना कठिन है। और यदि ज्ञान भी हो जाय तो भी चित्त- वृत्ति का स्थिर रहना कठिन है। यह स्थिति तो केवल भगवत्कृपा से ही होती है, इसका कोई अन्य साधन नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास जी भी कहते हैं :--अतः विषयों से मन को हटाकर भगवत्तत्व गुरु से पूर्ण श्रद्धा के साथ समझकर उनके बताये गए मार्ग का ही अनुसरण करना चाहिए। तभी हमारा कल्याण होगा। जो मनुष्य संसार को नाशवान और हरि- गुरु को सदा का साथी समझकर चलता है, वही उत्तम गति पाता है।......जगद्गुरू श्री कृपालु महाराजजी।
आरती माधुरी पद संख्या २ युगल सरकार की आरती आरती प्रीतम , प्यारी की , कि बनवारी नथवारी की । दुहुँन सिर कनक - मुकुट झलकै , दुहुँन श्रुति कुंडल भल हलकै , दुहुँन दृग प्रेम - सुधा छलकै , चसीले बैन , रसीले नैन , गँसीले सैन , दुहुँन मैनन मनहारी की । दुहुँनि दृग - चितवनि पर वारी , दुहुँनि लट - लटकनि छवि न्यारी , दुहुँनि भौं - मटकनि अति प्यारी , रसन मुखपान , हँसन मुसकान , दशन - दमकान , ...

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राधे राधे ।