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((( श्रीहरि ने सुधारी देवेंद्र की बुद्धि )))

इंद्र ने एक बार घमंड में भरकर ऐसा सभागार बनवाने का निर्णय लिया जैसा कभी किसी ने न बनवाया हो. तुरंत विश्वकर्मा को काम में लगा दिया गया. सभागार बनने लगा.
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विश्वकर्मा काम पूरा कर इंद्र को निरीक्षण के लिए बुलाते तो इंद्र कुछ न कुछ मीन मेख निकाल देते और फिर नए सिरे से काम करने का आदेश दे देते. इस कारण विश्वकर्मा का काम लगातार सौ साल तक चला लेकिन भवन पूरा ही न हो सका.
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भगवान विश्वकर्मा को इन सौ सालों से एक भी छुट्टी नहीं मिल सकी. विश्वकर्मा जी परेशान होकर ब्रह्माजी के पास पहुंचे और परेशानी बताई. विश्वकर्मा की यह दुर्गति देख ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु से इसका समाधान निकालने को कहा.
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विष्णुजी ने सारी बात सुनने के बाद तय किया कि इंद्र का घमंड नष्ट किए बिना बात नहीं बनेगी. भगवान ने बटुक यानी छोटे ब्राह्मण बालक जो शिक्षा ग्रहण के लिए गुरूकुल जाते हैं. बटुक बनकर श्रीहरि इंद्र के पास गए.
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उन्होंने इंद्र से पूछा- मैं आपके अद्भुत भवन निर्माण की दूर-दूर तक फैली प्रशंसा सुनकर आया हूं. यह भवन कुल कितने विश्वकर्मा मिलकर तैयार कर रहे हैं और यह पूरी तरह बनकर कब तक तैयार हो जायेगा ?
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इंद्र ने उपहास की मुद्रा में कहा- यह भी कोई प्रश्न हुआ ? क्या विश्वकर्मा भी दो-चार हुआ करते हैं ? बटुक बोले- इतने से घबरा गए देवेंद्र ? न जाने कितने ब्रह्मांड हैं और उसमें न जाने कितनी तरह की सृष्टि. उस सृष्टि में न जाने कितने ब्रह्मा, विष्णु महेश.
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इंद्र के कुछ समझने से पूर्व बटुक ने कहा- देवराज आप धरती के धूलकण गिन सकते हैं पर इंद्र और विश्वकर्मा की गिनती नहीं हो सकती. जैसे नदी में नौकाएं तैरती हैं वैसे ही महाविष्णु के रोमकूप के बीच जो पानी है उसमें तमाम ब्रह्मांड तैरते हैं.
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बटुक रूपी भगवान का यह प्रवचन चल ही रह था कि तभी वहां कतार लगाए हुए चींटे गुजरे. बटुक और इंद्र ने भी उसे देखा. चींटों को देखकर बटुक हंसने लगे. इंद्र ने कहा- अब क्या हुआ, चींटों को देखकर क्यों हंस रहे हो ब्राह्मण कुमार ?
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बटुक ने कहा- आप जिन चींटों को देख रहे हैं कभी ये भी इंद्र हुआ करते थे परंतु आज कर्मों के हिसाब से इन्हें यह योनि भुगतनी पड़ रही है. कर्मों का भी खेल निराला है. ये भगवान को इंसान और इंसान को श्वान बना दें.
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बात आगे बढती कि तभी वहां एक बहुत बुजुर्ग मुनि सिर पर चटाई ओढे, माथे पर सफेद तिलक लगाए आ पहुंचे. शरीर तो जर्जर हो गया था लेकिन उनका मुख तेज के कारण चमक था. उनके सीने पर बालों का एक चक्राकार गुच्छा था.
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इंद्र ने मुनि को नमस्कार कर बैठने का स्थान दिया. बटुक ने पूछा- हे महामुने आप कौन हैं ? यह आपके सीने पर बालों का ऐसा विचित्र सा गुच्छा क्यों हैं ? आप जैसे तेजस्वी मुनि ने यह सिर पर चटाई क्यों ओढ रखी है ?
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मुनि बोले- बटुक, जीवन के असंख्य बरस बीत जाने पर भी मैंने न तो कोई रहने का ठिकाना बनाया, न विवाह कर  के घर बसाया और न ही कोई आजीविका खोजी. अब मैं धूप, बारिश, सर्दी सब से बचने के लिए हमेशा ही यह चटाई ओढकर चलता हूं.
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मेरे सीने पर बालों का जो गुच्छा है इसके कारण मुझे लोमश कहते हैं.यही मेरी आयु का प्रमाण भी है. एक इंद्र के पतन होने पर सीने का एक रोआं गिर जाता है. दो कल्प समाप्त होने पर पिछले कल्प के जब सारे ब्रह्मा खत्म हो जाएंगे तब मेरा भी अंत हो जाएगा.
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लोमश कहते रहे- बटुक, सबको जाना है. असंख्य ब्रह्मा आए और गए फिर मैं घर, पत्नी, संतान, धन की इच्छा क्यों करुं ? भगवत प्राप्ति ही मेरे लिए संपत्ति और मोक्ष का मार्ग है. यह कहकर लोमश मुनि अंतर्धान हो गए. बटुक भी चले गए.
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इंद्र सन्नाटे में खड़े यह सोचते रहे कि जिसकी इतनी लंबी उम्र है वह एक घास फूस का घर भी नहीं बनाते, चटाई ओढे जीवन गुजारते हैं और मैं इतना बड़ा भवन बनवा रहा हूं. उन्हें अपने निर्णय पर पछतावा हुआ.
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इंद्र ने तत्काल विश्वकर्मा को बुलवाया. क्षमा प्रार्थना के साथ काफी धन देकर कार्य को रोकने का अनुरोध किया. बटुक और लोमश की बातें सुनकर इंद्र का मन विरक्त हो उठा. स्वर्ग के ऐश्वर्य से उन्हें घबराहट होने लगी. उन्हें अपना अगला जीवन चींटे का दिखने लगा.
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सोच विचार कर इंद्र ने वन में रहकर तप का निर्णय किया. वह अपने आलीशान महल से निकले ही थे कि देवताओं के गुरु वृहस्पति उन्हें मिल गए. वृहस्पति ने सारी बात सुनी फिर उन्हें समझा बुझा कर फिर से राज-काज में लगा दिया. (स्रोत: ब्रह्मवैवर्त पुराण)
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