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श्रीप्रिया भावना

श्री किशोरी जु स्वयं प्रेम को परम रूप हैं , उनके प्रेम की दिव्यता अनिर्वचनीय है ... जगत तो प्रेमशून्य है और मोरी स्वामिनी प्रेम को विग्रह , कौन कहे वांकी । प्रेम तत्व वाणी से कहा नहीं जा सकता परंतु फिर भी हम बार बार प्रेम के विषय में पढते हैं , कहते हैं , सुनते हैं जिससे हममें प्रीति का लोभ जाग्रत हो । श्री प्रिया के अति गहन प्रेम को भी बार-बार कहने का लोभ यही है कि उनके गुणानुवाद से हमारा चित्त हमारी वाणी पवित्र हो , श्रीश्यामा के प्रेम को तो श्यामसुन्दर भी नहीं कह पाते , वे तो इसलिए नहीं कह पाते कि क्षणार्ध मात्र उनका चिंतन करते ही वे उस प्रेम महासिंधु में डूब जाते हैं तो कहें कैसे  , यह स्वरूप उनका निजानन्द है । हम तो अपनी अति क्षुद्र मति से प्यारी के प्रेम की महिमा गा कर हृदय को निर्मल करना चाहते हैं , कैसा अद्भुत प्रेम है प्यारी का ... निरुपाधिक प्रेम की चरम अवधि है श्री राधा प्रेम ! अर्थात् ऐसा प्रेम जो किसी भी कारण से न प्रकट होता है न कम होता है ॥यह प्रेम स्वतः सर्वसमर्थ है  .. उनके प्रेम के लिये कभी किसी कारण अर्थात् रूप गुण आदि का आश्रय नहीं चाहिये ... जो बिना हेतु के प्रकट है वही प्रेम है  .. इसी प्रकार अनुकूलता या प्रतिकूलता कोई भी इस पर प्रभाव नहीं डाल सकती ... प्रत्येक परिस्थिति में अक्षुण्ण रहता है श्री प्रिया प्रेम... यद्यपि लीला राज्य में प्रतिकूलता नामक कोई परिस्थिति नहीं होती परंतु फिर भी इस प्रेम की दिव्यता सदा अखंड एकरस रहती है !  श्री प्रिया कहती हैं है प्राण-प्यारे चाहें आप मुझे हृदय से लगायें अथवा मेरा परित्याग करें मैं नित्य आपकी ही हूँ  ... और आप ही एकमात्र मेरे सर्वस्व ... प्रेम का स्वरूप यही तो है । अभिन्न है परन्तु प्रियतम सुख में त्याग भी प्रियतम का अनुग्रह है । हमारे परित्याग और प्रिया जु की परित्याग भावना भिन्न है , वह स्वभावतः और स्वरूपतः प्रियतम से अभिन्न है । श्री प्रिया केवल प्रियतम सुख को ही जीतीं हैं ... प्रियतम सुख ही उनका स्वरूप है ... उनके अस्तित्व का मात्र हेतु ही प्रियतम सुख है ... वे नित्य प्रियतम के सुख से सुखी हैं ! प्रियतम सुख ही स्व सुख उनका .. यदि श्यामसुन्दर को उनके सानिध्य से सामिप्य से सुख हो रहा है तो वही वरेण्य है परंतु यदि प्रियतम को उन्हें स्वयं से दूर कर सुख मिल रहा है तो इससे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं उनके लिये ... चाहें अपनायें या उपेक्षा कर दे श्री प्रिया का प्रेम नित्य एकरस है ... उन्हें आलिंगन में भी उतना ही सुख है जितना उपेक्षा में क्यों क्योंकि प्रियतम को सुख हो रहा है ...  प्रियतम का सुख ही अभिष्ट । अपेक्षा -उपेक्षा तो उसे होती है जहाँ हृदयगत पृथकता हो । वे नित्य श्यामसुन्दर से मिलित हैं नित्य विहाररत हैं क्यों ... क्योंकि प्रियतम को सुख हो रहा है (आनंद को महानन्दप्रदायिनी) ॥ ये भावना तो श्री प्रिया हृदय की अति सूक्ष्म झलक मात्र है ...उनका प्रेम तो अनन्त अपार और अथाह है ... अनिवर्चनीयता के ही बीज से उनके प्रेम रस का स्फुरण है । कोई कहें भी कैसे ... जीव के नेत्र , युगल रस - प्रेम - पिपासा के तत्व में डूबते भी तो नहीं । जीव तो भोगार्थ - स्वार्थ में व्यस्त है । सम्पूर्ण तृषाओँ (व्याकुलताओं) की सुधा निधि श्रीप्रिया का गुणानुवाद भी करता है तो भोगार्थ लक्ष्य या स्वार्थपरता में ... ... स्वार्थ शुन्य होकर पुकार कर देखिये ... है मेरी श्रीप्रिया ... हे प्यारी । हे रँगीली , रसीली , मनमोहिनी । निर्मल हृदय पुकारें उससे प्रथम हृदय पट कम्पन-स्पंदित हो उठता इस अप्राकृत दिव्य माधुर्या की नामामृत सरस् लहरियों में ... प्राणप्रियतम प्यारी श्यामा श्री कुंजबिहारिणी हमारी । तृषित । जयजय श्रीश्यामाश्याम जी ।

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