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वंशिका 1

जय जय श्यामाश्याम

वंशिका 1

वृन्दावन हमारे प्यारे युगल चन्द्र हमारे प्रिया प्रियतम युगल किशोर का प्रेम राज्य है जहां सर्वत्र उनका प्रेम ही आलोकित हो रहा है। यहां का कण कण ,लता पता सब दिव्य हैँ जो युगल के प्रेम रस से छके पगे हुए हैँ। इस प्रेम राज्य का किञ्चित् भी आस्वादन श्री युगल किशोर की इच्छा उनकी कृपा पर ही निर्भर है। इस रस मई प्रेम सागर में युगल प्रेमी उनके प्रेम में डूब पुनः पुनः गोते लगाते हैं और सखियाँ रुपी मोती इस प्रेम सागर में भरे पड़े हैँ। यही मोती इस युगल का श्रृंगार हैँ। ये अपने भाव पुष्पों द्वारा श्री युगल का नित्य श्रृंगार करती हैँ और युगल के आनन्द में आनन्दित होती हैँ।

   इस अद्भुत प्रेम साम्राज्य में वंशिका अपने राग द्वारा प्राणों का संचार करती है। ये वंशिका श्री प्रियतम की चिरसंगिनी है। सदा श्री श्यामसुन्दर के अधरामृत की पिपासु। श्री श्यामसुन्दर अपने अधरों के स्पर्श से इसमें राधा नाम सुना प्रेम का संचार करते हैँ जो वंशिका द्वारा सम्पूर्ण प्रेम राज्य में प्रेम को निर्झरित करती है। श्री युगल का प्रेम राग अलापना ही इस वंशिका का जीवन है। श्री प्रियतम सदैव इसे अपने संग रखते हैँ। कभी उनके करों में कभी उनके पीताम्बर कभी उनके अधरों के स्पर्श से तो ये उन्मादिनी हुई जाती है। जब श्री प्रियतम अपने अधरों से स्पर्श करते हैँ तो उनके प्रेम रस को सर्वत्र फैलाती है। इस वंशिका का प्रेम नाद जब श्री प्रिया के कर्णपुट तक जाता है तो कभी उस विरहणी को प्रियतम का संदेस देता है परन्तु कभी कभी अपनी स्वामिनी के हृदय में प्रेमोउन्माद भी जगा देता है। कभी कभी तो श्री स्वामिनी इसकी तान सुन बलिहार जाती है । वंशिके ! तू प्रियतम का सन्देस लाई है मेरे श्यामसुन्दर मुझसे कितना प्रेम करते हैँ। इस दशा में तो वंशी अपने को सम्भाल नहीं पाती। स्वामिनी जू जब इसे अपने करों में धारण करती है तो इसका उन्माद देखते ही बनता है। कभी कभी ये वंशिका जैसे श्यामसुन्दर को अपने भीतर ही समा लेती है। अपनी प्रियतमा के अधरों का पान करने हेतु श्यामसुन्दर इसी में समा जाते। उस दशा में जब प्यारी जू वंशी में स्वर भरती हैँ तो इस प्रेम राज्य पर तो जैसे रस की अद्भुत वृष्टि हो जाती है । इस दशा में तो श्याम सुंदर भी प्रेम में डूबने लगते हैँ।

क्रमशः
जय जय श्यामाश्याम

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