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एकांत साधना भाग -३

सभी साधक जन को सम्मान दो , सभी के साथ सम्मानजनक शब्द का इस्तेमाल करो  , किसी को छोटा  मत समझो, किसी को दु:ख मत दो , अहंकार मत करो , मिथ्या भाषण मत करो , सबमें तुम्हारे इष्ट है | संसार में भी घोर संसारी के साथ भी दुर्भावना ना करो , केवल एकातं साधना के समय ही नही अपितु हमेशा हर पल प्रभु के सिद्धान्त को याद रखे , क्योकि प्रभु का कानुन है
" सर्वेषु कालेषु मांमनुस्मर युध्द च "
हरेक समय हरेक में अपने इष्ट को महसुस करो , इसको कहते है कर्मयोग की साधना ,
जैसे   हम औफिस जा रहे है | हां ! एक को देख कर मुड खड़ाव हो गया !
ये कौन है ? एक सुपरिटेण्डीगं इंजीनियर है , नाम क्या है ? रमेश श्रीवास्तव , धाम क्या है ? वांका वाले है , गुण ? ये बड़ा बदमाश है , परेशान करता है ,  इसके कारण बहुत मेरा बील अटका परा है , पैसा अटका परा है !
तो नाम रमेश श्रीवास्तव, ठीक  , धाम - वांका वाले , ठीक , गुण - बड़ा बदमाश है , ठीक |
परन्तु अरे ये कौन है , ये तो जीव शक्ति है , ये जीव शक्ति के संधिनी अनुभाव के परिणाम है ,
ये जीव शक्ति कौन है ? ये परा शक्ति का वैभव है !
ये परा शक्ति कौन है ? ये हमारे इष्ट श्री कृष्ण की शक्ति है | तो इसके पिछे कौन खड़ा है | अरे इसके पिछे तो हमारे प्रियतम खड़े  है |
अरे ये तो हमारे इष्ट सब करा रहे है भाइ , और हम गाली किसको दे रहे है ?
अरे ये तो गलत हो रहा है | इसमें तो हमारे इष्ट है और हम बुरी भावना किए जा रहे है |
इस प्रकार हम बुरे भाव से बच जाऐगें और साथ साथ हर पल हमारी साधना भी हमेशा होती जा रही है , इसी को कहते है कर्मयोग की साधना |
केवल दो घण्टे की साधना करें और वांकी समय पाप करे यह नही चलेगा | हरेक में हर समय  हमारे प्रियतम है ! ऐसा हमेशा ही महसुस करें |
किसी का , किसी का भी , ध्यान दिजिए , किसी का भी अपमान मत करिए ,
कठोर मत बनिए |
नही तो आपकी दो घण्टे की साधना से कुछ लाभ नही होने बाला | :- महराज जी के सिध्दान्त युगलशरण जी के शब्दो में

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