सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

श्री राधा की एक स्थिति

श्री राधा की एक स्थिति
~~~~~~~~~~~~

श्री राधा आज एक विचित्र सी स्थिति में हैं । उनका रोम रोम कृष्णमयी है परन्तु वो ये अनुभव करती हैं कि कृष्ण से वो कभी मिली ही नहीं हैं। सखी ये कृष्ण कौन हैं ?कैसे हैं ? क्या तुमने इनको देखा है ? मुझे इनके नाम से ही जाने क्या हो रहा है। देखो ये मेरे कंगन कृष्ण कृष्ण ही पुकारते हैँ। मेरी नुपुर के घुँघरु ये भी उन्मादित हो रहे। इनको भी कृष्ण कृष्ण के सिवा कुछ सूझता ही नहीं है। देखो हर ध्वनि केवल कृष्ण कृष्ण कृष्ण .......मुझे कुछ और सुनाई ही नहीं दे रहा।

   सखी मुझे बताओ ये कृष्ण कौन हैं मेरा मन बलात् ही अपहरण किये हुए हैँ। क्या किसी को बिन देखे बिन जाने भी ऐसे हो जाता है। मुझे इनके सिवा न कुछ अच्छा लग रहा है न ही कुछ सूझ रहा है। श्री राधा कृष्णसिन्धु में ऐसी डूबी हुई हैँ की उन्हें और कुछ लगता ही नहीं है।

    इस सिंधु से विभिन्न तरंगे प्रवाहित हो रही हैं । कभी कृष्ण कृष्ण कहती कहती मूर्छित हो जाती हैं । पुनः चेतन होती हैँ तो कृष्ण कृष्ण को ही पुकारती हैं। कभी कभी अनुभव करती हैँ की कृष्ण बाहर आ गए हैं सहसा बाहर की और दौड़ पड़ती हैं । कभी कभी टकरा कर गिर पड़ती हैँ। सखियाँ उन्हें इस स्थिति से बाहर लाने की बहुत चेष्ठा करती हैँ ।

   राधा पुनः चेतन होती हैं और एक सखी को अपने सन्मुख देखती हैं और उसे ही कृष्ण मान लेती हैं। कृष्ण तुम आ गए इतनी देर तक तुम कहाँ थे। देखो कब से तुम्हें पुकार रही हूँ । सखी से लिपट जाती हैं और जोर जोर से कृष्ण कृष्ण कह रोने लगती हैं । सखी उन्हें कहती है राधे राधे देखो तो मैं तो तुम्हारी सखी हूँ मैं कृष्ण नहीं हूँ। रोते हुए पुनः सखी की और देखती हैं और कहती हैं नहीं नहीं तुम कृष्ण ही हो। देखो तुम ही कृष्ण हो मुझ से छिपो नहीं कह दो तुम ही कृष्ण हो। पुनः रुदन करती करती मूर्छित हो जाती हैं। पता नहीं उनकी ये स्थिति कब तक रहने वाली है।

  जय जय श्री राधे

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

🌼 युगल सरकार की आरती 🌼

 आरती माधुरी                      पद संख्या २              युगल सरकार की  आरती  आरती प्रीतम , प्यारी की , कि बनवारी नथवारी की ।         दुहुँन सिर कनक - मुकुट झलकै ,                दुहुँन श्रुति कुंडल भल हलकै ,                        दुहुँन दृग प्रेम - सुधा छलकै , चसीले बैन , रसीले नैन , गँसीले सैन ,                        दुहुँन मैनन मनहारी की । दुहुँनि दृग - चितवनि पर वारी ,           दुहुँनि लट - लटकनि छवि न्यारी ,                  दुहुँनि भौं - मटकनि अति प्यारी , रसन मुखपान , हँसन मुसकान , दशन - दमकान ,                         ...

🌿।।श्री राधावल्लभो जयति।।🌿 🌿।। श्री हित हरिवंशचन्द्रो जयति।।🌿

🌿।।श्री राधावल्लभो जयति।।🌿 🌿।। श्री हित हरिवंशचन्द्रो जयति।।🌿 🌷 श्री वृंदावन-सत लीला 🌷 क्रमशः से आगे.... 🌿बसिकै वृंदाविपिन में, इतनौ बडौ सयान। जुगल चरण के भजन बिन, निमिष ...

श्रीरामचरितमानस– उत्तरकाण्ड दोहा संख्या 129से आगे ..... चौपाई :

सभी स्नेही मानसप्रेमी साधकजनों को हमारी स्नेहमयी राम राम | जय सियाराम जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम श्रीरामचरितमानस– उत्तरकाण्ड दोहा संख्या 129से आगे ..... चौपाई : यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा।। भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा।। राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह कें कछु नाहीं।। रघुपति कृपाँ जथामति रावा। मैं यह पावन चरित सुहावा।। एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा।। रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि।। जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना।। ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई।। भावार्थ: शम्भु-उमाका यह कल्याणकारी संवाद सुख उत्पन्न करने वाला और शोक का नाश करनेवाला है। जन्म-मरणका अन्त करने वाला, सन्दहों का नाश करनेवाला, भक्तोंको आनन्द देनेवाला और संत पुरुषोंको प्रिय है।।जगत् में जो (जितने भी) रामोपासक हैं, उनको तो इस राम कथा के समान कुछ भी प्रिय नहीं है। श्रीरघुनाथजीकी कृपासे मैंने यह सुन्दर और पवित्र करनेवाला चरित्र अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है।। ...