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मानलीला

मानलीला

मानसरोवर की मानलीला को चाचा वृन्दावनदास ने इस पद द्वारा मुखरित किया है ।

पुनि-पुनि लाल भाँवरे लेत ।
को जानै इहि मानसरोवर तट भूले चित चेत ॥

मानसरोवर, श्रीकृष्ण का बड़ा प्रिय स्थान है । बारबार श्रीकृष्ण मानसरोवर पर आते हैं । कभी श्रीजी के साथ फाग खेलने के लिए तो कभी उन्हें मनाने के लिए तो कभी उनका दर्शन पाने के लिए ।

मानसर सोभा संघट माई ।
जहां कछु होत मान को संभ्रम नागरि गहत भुराई ।
अवनी अमल तहां प्रतिबिम्बित गोरे तन पै छाई ।

एक समय प्रिया-प्रियतम बैठे हुए थे । यहाँ की मणि-माणिक्यमयी भूमि में श्रीजी के गौर वर्ण पर लाल जी का नीला प्रतिबिम्ब पड़ा एवं लाल जी के नील कलेवर पर श्रीजी का गौर प्रतिबिम्ब पड़ा । उस प्रतिबिम्ब को देखकर ही मानिनी मान कर बैठी ।

सो पिय मुकुर मांहि जब लखियत तब हठ करत महाई ।

श्रीजी बोलीं – "लाल जी ! यह कौन है, जो आपके वक्ष पर बैठी हुई है? ” इस भोरेपन को सुनकर लाल जी बोले – "प्यारी जू ! यह कोई अन्य नायिका नहीं है, यह आपका ही प्रतिबिम्ब है, जो मेरे विग्रह पर दिखाई दे रहा है ।” श्रीजी बहुत भोरी हैं, बोलीं – "हम कैसे मान लें? ” तब ठाकुर जी ने विश्वास दिलाने के लिए एक युक्ति सोची । बोले – "देखो राधे ! हम आपको माला धारण करायेंगे तो वह माला यहीं हमारे विग्रह में भी आ जायेगी, तब तो आप मानोगी कि वक्षासीन कोई अन्य नहीं, आप ही हैं ।”

श्रीजी बोली – "हाँ ! मान लेंगी ।”

झट लाल जी ने एक वन्य-सुमनमाला श्रीजी को धारण कराई । माला प्रतिबिम्ब में भी आ गई । श्रीकृष्ण बोले – "मैंने सत्य कहा था न राधे !”

अब देखना हम आपके गले से माला उतारेंगे तो प्रतिबिम्ब पर भी माला नहीं रहेगी, कहकर माला उठा ली तो प्रतिबिम्ब भी माल्य शून्य हो गया । अब गोरी भोरी श्रीजी ने मान-त्याग किया ।

जब उर कुसुम दाम उर मोरत मान चोर वसि जाई ।

यह तो मेरा ही प्रतिबिम्ब है, ऐसा जब श्रीजी को विश्वास हो गया तो श्रीजी के हृत्प्रांगण से मान रूपी चोर भाग गया एवं मिलन हो गया ।

तब रस रंग बढ़त-बढ़त छिन-छिन प्रति कुञ्ज सुभग थल आई ।
सर के तीर लता निज मंदिर केलि करत मन भाई ।
'वृन्दावन' हित रूप जाऊं बलि अलि दृग वांछित पाई ।

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