. 💰- *श्रीराधातत्व और श्री राधा-स्वरूप* -💰
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*श्रीराधे बृषभानुजा भक्तनि प्राणाधार,*
*वृन्दाविपिन विहारिणी प्रणवों बारम्बार..!!*
*जैसो तैसो रावरो कृष्णप्रिया सुख धाम,*
*चरण शरण निज दीजिये सुन्दर सुखद ललाम..!!*
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*-:एक स्वरूप दो देह श्रीराधाकृष्ण:-*
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भगवान श्रीकृष्ण की आत्मा ही श्रीराधिका हैं,
श्रीराधा और श्रीकृष्ण का देह एक है.. केवल लीला
के लिए ही वे दो स्वरूपों में प्रकट हैं।
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श्रीकृष्णजी ने कहा है :~ 'जो मेरी शरण में आ गया,
पर मेरी प्रिया की शरण में नहीं आया, वह मुझको
प्राप्त नही होगा।' इसीलिए श्रीराधा की प्रसन्नता के
लिए उनके प्रियतम श्रीकृष्ण की अनन्यशरण होकर
उनकी आराधना करनी चाहिए। मतलब यह है कि
युगलस्वरूप की ही आराधना करनी चाहिए।
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*‘राधा’* नाम के पहले अक्षर *‘र’* का उच्चारण करते ही
करोड़ों जन्मों के संचित पाप और शुभ अशुभ कर्मों
के भोग नष्ट हो जाते हैं। आकार (।) के उच्चारण से
जन्म, मृत्यु और रोग छूट जाते हैं। *‘ध’* के उच्चारण
से आयु की वृद्धि होती है और आकार के उच्चारण से
जीव भव-बंधन से छूट जाता है।
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*कृष्णेन आराध्यत इति राधा,*
*कृष्णं समाराध्यति सदेत राधिका !!*
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श्रीकृष्ण इनकी आराधना करते हैं, इसलिए ये *राधा* हैं
और
ये सदा श्रीकृष्ण की समाराधना करती हैं..
इसलिए *‘राधिका’* कहलाती हैं।
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श्रीराधाजी का प्राकट्य भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष
की अष्टमी तिथि को मध्याह्न काल में अभिजित् मुहूर्त
और
अनुराधा नक्षत्र के योग में बरसाना में राजा बृषभानु
और
रानी कीर्तिदा के घर हुआ। श्रीराधा जगत की रचना
करने वाली, पालन करने वाली और प्रलय के समय
संहार करने वाली हैं।
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राधाष्टमी के दिन श्रीकृष्ण और श्रीराधा की उपासना
मध्याह्नकाल (दोपहर) में गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और
नैवैद्य से करें। एक बार सात्विक भोजन करें,
इस व्रत को करने से मनुष्य राधाजी के सांनिध्य में
वृन्दावन में वास करता है।
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*जनम लियो वृषभानु लली।*
*आदि -शक्ति प्रकटी बरसाने, सुरभित सुरभि चली ।।*
*जलज-चक्र,रवि तनया विलसति, सुलसति लसति भली।*
*पंकज दल सम खिलि-खिलि सोहै, कुसुमित कुञ्ज लली ।।*
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*पलकन पुट-पट मुंदे 'श्याम' लखि मैया नेह छली।*
*विहंसनि लागि गोद कीरति दा, दमकति कुंद कली॥*
*नित-नित चन्द्रकला सम बाढ़े, कोमल अंग ढली।*
*बरसाने की लाड़-लडैती, लाडन -लाड़ पली॥*
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श्रीराधा के प्रसिद्ध सोलह नाम पुराणों में आते हैं,
जो इस प्रकार हैं :-
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राधा,
रासेस्वरि,
रासवासिनी,
रसिकेस्वरि,
कृष्णप्राणाधिका,
कृष्णप्रिया,
कृष्णस्वरूपिणी,
कृष्णा,
परमानन्दरूपिणी,
कृष्णवामांगसम्भूता,
वृन्दावनी,
वृन्दा,
वृन्दावनविनोदिनी,
चन्द्रावली,
चन्द्रकान्ता
और
शरतचन्द्रप्रभानना।
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*वन्दे वृन्दावनानन्दां राधिकां परमेश्वरीम्*
*गोपिकां परमां श्रेष्ठां ह्लादिनीं शक्तिरूपिणीम्*
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राधा मेरी स्वामिनी मैं राधेजू को दास
जन्म जन्म मोहि दीजियो युगल चरण में वास
सब द्वारन कू छोड़ के आयी तेरे द्वार
श्री बृषभानु की लाड़ली मेरी ओर निहार
वृन्दावन के वृक्ष को मरम न जाने कोय
डाल डाल और पात पात पर राधे ही राधे होय
श्री बृषभानु दुलारी के पद वन्दऊँ कर जोर
जिनकी कृपा कटाक्ष से सुख उपजत चहुँ ओर..!!
🌸💰 *"जय श्री कृष्ण~जय श्री राधे"*🌹🙏🌹
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