श्री राधे --
★ सोई सेवक प्रियतम मम् सोई--
मम अनुशासन माने जोई--
अगर नौकर अपने मालिक की आज्ञा का पालन करता है तो मालिक को खुशी मिलती है--उसी प्रकार भगवान की आज्ञा मानने से ही भगवान को प्रसन्नता मिलती है-भक्ति का अर्थ है सेवा-- सेवा यानि भगवान की आज्ञा पालन करना---"आज्ञा सम नाहि साहिब सेवा" अब प्रश्न उठता है की भगवान की क्या आज्ञा है?? वैसे तो भगवान की बहुत सारी आज्ञाएं है-- लेकिन भगवान की मुख्य आज्ञा है की-- "मन्मना भव"- अर्थात् मुझमे मन लगाओ-- भगवान मे मन लगाना ही भगवान की आज्ञा का पालन करना है-- ओर ये बात भी याद रखना मन से किया हुआ भजन ही भगवद्प्राप्ति की तरफ लेकर जाता है-- भगवान ने अर्जुन से अर्जुन की आंखे,पैर,नाक,कान नही मांगा-- अर्जुन से बस ईतना कहा की मन ओर बुद्धि मुझमे लगाकर निरंतर मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो-- क्योकि जब मन भगवान मे लग जाएगा तो सारी ईन्द्रियां खुद भगवान मे लग जाएंगी-- सब ईन्द्रियां मन की दासी है-- ईसलिए मन से भगवान का स्मरण ,मन से कीर्तन ओर मन से श्रवण करना चाहिये-- मन से जब आज्ञा पालन होगी तभी भगवान की कृपा होगी ओर भगवद्प्राप्ति होगी-- गोपियो ने भी मन प्रभु मे लगाया --सब भक्तो ने मन भगवान मे लगाया तब भगवान मिले -- ओर कहा भी गया है की " मनेर स्मरण प्राण"-- शरीर से प्राण हटा दो तो शरीर किसी काम का नही रहता है उसी प्रकार साधना मार्ग मे अगर मन हटा दिया-- मन प्रभु के नाम ,गुण,लीला ,रुप मे नही लगाया तो उत्तम प्रेमानंद प्राप्त नही होगा---ईसलिए मन भगवान मे लगाकर भगवान का भजन करना है-- बोलिए श्रीमद्भागवत महापुराण की जय-- राधे राधे
आरती माधुरी पद संख्या २ युगल सरकार की आरती आरती प्रीतम , प्यारी की , कि बनवारी नथवारी की । दुहुँन सिर कनक - मुकुट झलकै , दुहुँन श्रुति कुंडल भल हलकै , दुहुँन दृग प्रेम - सुधा छलकै , चसीले बैन , रसीले नैन , गँसीले सैन , दुहुँन मैनन मनहारी की । दुहुँनि दृग - चितवनि पर वारी , दुहुँनि लट - लटकनि छवि न्यारी , दुहुँनि भौं - मटकनि अति प्यारी , रसन मुखपान , हँसन मुसकान , दशन - दमकान , ...
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राधे राधे ।